Dharm

    भारत एक संपन्न और समृद्ध देश था, यह कई राज्यों का संघ था, यहां धर्म की परिभाषा कर्म से की जाती थी, भारत व्यापार, वाणिज्य, शास्त्र, औषधि, योग, विज्ञान और कला का केंद्र था, इन्ही विशेषताओं ने बाहरी दुनिया को भारत के तरफ आकर्षित किया और भारत को जितने की उनमें लालसा जागने लगी। लेकिन उनके लिए इस राज्यों के संघ को जितना मुश्किल था। इसलिए इन्ही शक्तियों ने भारत की कूटनीति को समझा और उसे भारत के हिंखिलाफ इस्तेमाल किया, उन्होंने यहां प्रांत के आधार पर मतभेद निर्माण किए, कर्मो के आधार पर जातियों का निर्माण किया गया और इन्ही जाति मतभेद की राजनीति में राज्यों में द्वंद का माहोल बना, जहा उचनिच की राजनीति का इस्तेमाल लोगो मे फुट डालने और आंतरिक युद्ध की स्थिति निर्माण करनें में हुआ। मुग़ल, पर्शियन, अंग्रेज़, अलग अलग शक्तियां भारत पर अपना राज्य चाहती थी। इस कारण वश यहां कई युद्ध हुवे, कई शाशन बदले, हर शाशक ने अपना सकारात्मक प्रचार किया। जिस वजह से यह अलग अलग प्रांत के लोग आकर बसने लगे और उनकी अलग अलग मान्यताएं थी। इन्ही विभिन्न लोगो ने धर्म की परिभाषा बदल दी।


   भारत में कर्म को ही धर्म बोला जाता था। जैसे क्षत्रिय का धर्म रक्षा करना है, वैश्य का धर्म व्यापार करना है, राजा का धर्म सुशासन है, इसी प्रकार धर्म की परिभाषा कर्म से थी । लेकिन बाहरी शाशको के द्वारा भारत पर अपनी सत्ता स्तापन करने दौरान यहां विभिन्न लोगो का निवास होने लगा और उन्होंने धर्म की परिभाषा बदल दी, भारत में अलग अलग राज्यों का संघ अलग अलग मान्यताओं से भरा हुआ था इसलिए मान्यताओं पर धर्म ठहराए तो यहां धर्मो की बाढ़ आ जाएगी। इसलिए शायद धर्म को प्रांत के आधार पर परिभाषित किया गया। पारसी लोगो ने हमे सिंधु घाटी के वंशज बोलते हुवे हमे सिंधु वासी बुलाया गया।लेकिन अलग अलग भाषाओं के उच्चारण के त्रुटि के कारण हमे सिंधु वासी के जगह हिन्दू वासी बुलाया जाने लगा, जिस स्थान पर हम रहते थे उसे हिन्दुस्तान बुलाया जाने लगा। और मुघलो द्वार हमे हिन्दुस्तानी बुलाया जाने लगा।


  तो हिंदुस्तान कई राज्यों का एक संघ था, जहा मराठा, राजपूत, मारवाड़ जैसे शासक थे। और कई राजा अपने एडोस्पदोस के राज्यों से तालमेल बना कर अपना राज्य का सुचालन करते थे। बाहरी लोगो का यह बसने से प्रांतीय आधार पर धर्म को परिभाषित किया गया और हमें हिदू धर्म का जन्म देखने को मिला। तर्क के आधार पर देखा जाए तो हिन्दू धर्म नहीं बल्कि प्रांतीय पहचान है।


  सादिया बीतने के साथ साथ अलग अलग प्रांत के लोगो का भारत में बसना जारी रहा, इस दौरान उनकी अलग अलग मान्यताओं को वह लोग यहाके मूलनिवासियों पर थोपने लगे और, यहां के मान्यताओं पर सवाल उठने शुरू हुआ, जिस वजह से कहानियों ने जन्म लिया और अपने आधिपत्य को बरकरार रखने की जंग मे धर्म परिवर्नत करवाने और अन्य धार्मिक स्थलों को तोड़ने का सिलसिला शुरू हुआ। जिसने कट्टरपंथीयो को जन्म दिया, जो लोग धर्म को ही श्रेष्ठ समझने लगे। लेकिन उनकी तर्क बुद्धि उन्हे जागृत रखती थी, उन्हे पता था के उनकी मातृभूमि ही उनका धर्म है, और उनकी यह पहचान उनके मातृभूमि से होती है। इसी दौरान और कई अलग अलग मान्यताओं ने जन्म लिया और कई अद्वितीय लोगो को मानने वालो ने अपने धर्म को जन्म दिया और उसका जोरोषोरो से प्रचार भी किया। बौद्ध, जैन, ईसाई, पारसी, सिख, धर्मो की अपनी अलग पहचान होने लगी, यह लोग किसी प्रांत से बंधे हुवे नहीं रहे और नाही इनके धर्म की पहचान किसी प्रांत से होती थी। यह लोग अद्वितीय और असमन्या सर्वश्रेष्ठ इंसानों को मानने लगे जिन्हें वह अपना भगवान और धर्म मानने लगे और उसका प्रचार करते गए, जिस वजह से यह धर्म दुनिया के नक्शे पर उभरते गए। और इनके प्रति कट्टर मानसिकता भी बढ़ने लगी। मान्यताए तर्क का आधार छोड़कर विश्वास के आधार पर तय होने लगी और जल्द ही विश्वास ने अंधविश्वास को जन्म दिया। हर धर्म के गुरु सामने आने लगे और उनके आध्यात्मिक, लौकिक, अपसमन्य, शक्तियों के दावे सामने आने लगी। और इनपर विश्वास करने वालों ने इनका प्रचार किया और इन्है लोकप्रिय बनाने में योगदान दिया। इस दौरान अंधविश्वास से लड़ने वालों की सांख्य भी बढ़ने लगी जो अपने तर्क का इस्तेमाल करना जानते थे, मान्यताओं पर सवाल उठने शुरू रहे और धर्म के प्रति कट्टर मानसिकता बढ़ती गई। धर्म के आधार पर उचनीच होना शुरू था, श्रेष्ठत्व की जंग शुरू थी और सत्ता की जंग धर्म की जंग से श्रेष्ठ साबित हुई। शाशको को सत्ता के लिए धर्म का आधार लेते हुवे देखा गया। और अब कई सादिया बीतने के बाद भी सत्ता के लिए धर्म का इस्तेमाल किया जाता है, जबकि सत्ताधारियो का इस गणतंत्र मे धर्मनिरपेक्ष होना जरूरी है। 


  इस दौर मे 'धर्म' जन्म के आधार पर तय होती है, पिता के धर्म के आधार पर बच्चे का धर्म तय किया जाता है, और मरने तक उसी धर्म का पालन किया जाता है और उसे ही माना जाता है। धर्म परिवर्तन कि आजादी सबके लिए है लेकिन धर्मपरिवर्तन करना आसामाजिक समझा जाता है। यहां धर्म के आधार पर आरक्षण की सुविधा है।

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