Election, चुनाव एक व्यापार
भारत दुनिया का सबसे बड़ा गणतांत्रिक देश है। और यहां चुनाव एक त्योहार की तरह होता है, कई दिनों तक प्रचार माध्यम अलग अलग उमीदवार के अलग अलग तरह से प्रचार करते है। जिसमे रैली निकालना, घर घर जा कर लोगो से मिलना, पर्चे बटना, झंडे लहराना, भाषण देना, कई मंच खड़े कर लोगो का समय लेकर उन्हे आवाहन, आश्वासन, वादे, किए जाते है भविष्य की कल्पना और भूतकाल भी याद दिलाया जाता है। जहा प्रिंट मीडिया, न्यूज चैनल और सोशल मीडिया का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हो रहा है, प्रचार के लिए प्रचारक कई विज्ञापन दिखाते है और कई खबरे बनाए भी जाते है, हर उमीदवार अपने अपने प्रचार माध्यमों द्वारा सकारात्मक दृष्टिकोण से दर्शाया जाता है, और विरुद्ध उमीदवार को नकारात्मक दृष्टिकोण से दिखाया जाता है। कई विज्ञापन खबरों की तरह और कई खबरे विज्ञापन की तरह दिखाए जाते है। आपको याद होगा '' जनता माफ नहीं करेगी '' यह विज्ञापन सामान्य लोगो को अपनेपण का एहसास करवाता था। सोचिए अगर सभी प्रचार माध्यम किसी एक दल का प्रचार करने लगे और उसके विरोधियों को नकारात्मक दिखाने लगे, तो वहीं राजनेतिक दल बिना किसी उपलब्धियों के भी जीत सकता है। ऐसे प्रचारों और विज्ञापनों पर लाखो कोरोडो रू खर्च होते है। हर उमीदवार को अपने प्रचार के खर्च का लेखा चुनाव आयोग को देना होता है और चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों के प्रचार खर्च की एक सीमा तय कर रखी है। जैसे बड़े राज्यों में लोकसभा का एक उमीदवार ७०लाख तक खर्च कर सकता है जबकि छोटे राज्यों में यह सीमा ५४लाख तक तय है, और हर बार के चुनाव के समय यह सीमा पिछली बार से घटाई या बधाई जा सकती है। लेकिन यहां सिर्फ उम्मीदवारों के चुनाव खर्च की सीमा तय है, राजनीतिक दलों के प्रचार खर्च पर कोई सीमा तय नहीं की गई। इसलिए शायद राजनेतिक दाल इन्ही प्रचार माध्यमों द्वारा अपना प्रचार चुनाव के बाद भी जारी रखते है, ताकि जनता के समक्ष उनकी सकारात्मक छबि बनी रहे और विरोधियों का नकारात्मक छवि भी बनाए रखते है, ताकि जनता बुरे कामों के लिए आलोचना भी विरोधी दल की हिं करे।
चलिए आसान शब्दो में चुनाव की प्रक्रिया को समझते है,
भारत में फेडरल सिस्टम का पालन होता है, जहा दो सरकार प्रणाली है,
१) केंद्र सरकार, और २) राज्य सरकार
राज्य सरकार का संचालन विधानसभा के द्वारा होता है, और विधान सभा के सदस्य को विधायक बोला जाता है, विधायक को आम जनता चुनती है। याने आप लोग आम चुनावों द्वारा विधायक(MLA) को चुनते है और जिस पार्टी के ज्यादा विधायक चुने जाते है उस पार्टी के उमीदवार को मुख्मंत्री चुना जाता है।
अब केंद्र सरकार की बात करते है,
केंद्र सरकार मे दो कार्यप्रणाली है - लोकसभा और राज्यसभा, और यहीं दो कार्यप्रणाली मिलकर केंद्र सरकार का कार्यभार उठाती है। लोकसभा मे संसद के सदस्य होते है,जिन्हें सांसद(MP) कहा जाता है, और इन सांसद को आम जनता चुनती है। याने आप लोग आम चुनाव द्वारा इन्ही सांसदों को चुनती है। ५४५ सांसदों मे से ५४३ सांसद जनता द्वारा चुने गए और २ सांसद राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए जाते है। और जिस पार्टी के ज्यादा सांसद चुने गए उसी पार्टी के उमीदवार को बहुमत के साथ पंतप्रधान चुना जाता है। जब की राज्यसभा के सदस्यों का चुनाव विधायको(MLA) द्वारा होता है। आपके द्वारा चुने गए विधायक, राज्य सभा के २५० मे से २३८ सदस्य को चुनती है और १२ सदस्य को राष्ट्रपति नियुक्त करती है, राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए गए सांसदों मे सचिन तेंदुलकर और रेखा जैसे नामी हस्तियां भी शामिल हैं।
तो आप आम चुनाव द्वारा विधान सभा के लिए विधायक और लोकसभा के लिए सांसद को नियुक्त करते है। आप प्रत्यक्षित रूप से अपने विधायक चुनते है, लेकिन आप विधायक को मतदान कर अप्रत्यक्षित रूप से अपना मुख्यमंत्री चुनते है। इसिप्रकार आप प्रत्यक्षीत रूप से अपने सांसद को चुनते है, लेकिन आप सांसद को वोट करके अप्रत्यक्षित रूप से अपना प्रधानमंत्री चुनते है। इसे आपको समझना होगा।
देखिए किसी सांसद और किसी विधायक को अपने प्रचार पर खर्च चुनाव आयोग द्वारा दिए गए तय सीमा के अंदर ही करना होगा। लेकिन मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के उमीदवार सामने कर राजनीतिक दलों के लिए प्रचार पर होने वाले खर्च की कोई तय सीमा नहीं है और नाही कोई रोक है।जैसे आपको याद होगा " अब कि बार " का विज्ञापन।
आपने चुने हुवे विधायक और सांसद का काम क्या है? चलिए इसे आसान शब्दो समझते है। अपने कार्यक्षेत्र मे सुव्यवस्था बनाए रखे और सुचालू रूप से प्रगतिशील कार्यों को गति मिले, इसके अलावा जनता के हित के लिए शैक्षणिक, धार्मिक, कृषि, व्यापार, पर्यटन और आर्थिक मामलों मे योजनाएं, कानून, या किसी प्रकार का प्रावधान या अभियान का समर्थन करना या उसके लिए प्रस्ताव लाने का काम इन्हीं विधायक और सांसद का होता है। इनके द्वारा लाए गए प्रस्ताव को लोकसभा, राज्यसभा, और विधानसभा में बहुमत से समर्थन मिलने के बाद पास किया जाता है। फिर मुख्यमंत्री, पंतप्रधान, और राष्ट्रपति द्वारा उन्हे जनता के समक्ष लाया जाता है। इसके अलावा सरकारी खाते और सरकारी उद्योग भी इनके देख रेख मे होते है। और इस काम के लिए इन्हे वेतन कितना मिलता है? यह भी जान लेते है, एक विधायक को
२५,०००/- वेतन प्रति माह
५०,०००/- निर्वाचन क्षेत्र भत्ता
२०,०००/- घर किराया भत्ता प्रति माह
१५००/- विधानसभा बैठक में शामिल होने के लिए प्रति दिन का भत्ता
१७००/- राज्य के बाहर होने वाली बैठक में शामिल होने के लिए प्रति दिन का भत्ता
इसी तरह प्रत्येक विधायक को प्रति माह १लाख से ज्यादा की राशि मिलती है। और इनका कार्यकाल ५ साल का होता है याने उसकी ५ साल की कुल कमाई ६० से ८० लाख की हो सकती है, यह एक अनुमान है, बाकितो आप लोग समझदार है। अब एक सांसद को मिलने वाले वेतन कुछ इस प्रकार है,
५०,०००/- मासिक वेतन
२०००/- प्रतिदिन मिलने वाला दैनिक भत्ता
४५,०००/- संवैधानिक भत्ता
४५,०००/- कर्यालय व्यस्त भत्ता
प्रति साल ३४ मुफ्त हवाई यात्रा
निजी या सरकारी वाहन से यात्रा करने पर १६ रू प्रति km के हिसाब से यात्रा भत्ता
४ फोन के connection मुफ्त
४००० किलो लीटर पानी और ५०,००० यूनिट बिजली प्रति साल मुफ्त मिलती है,
CGSC के तहत स्वास्थ्य संबंधित सुविधाए मिलती है, जो क्लास १ अधिकारी को भी मिलती है, इन सब बातों पर उन्हे किसी प्रकार का कोई कर नहीं है(NO taxes), इस प्रकार इनको प्रति माह २लाख से ज्यादा की राशि मिलती है।और इनका कार्यकाल ६ साल का है, तो इनकी कुल कमाई १.४ से १.६ करोड़ की होनी चाहिए, यह भी एक अनुमान है, बाकी आप लोग समझदार है।
तो एक आम विधायक और सांसद की कुल आय तो हमने जान लिया, और उनके द्वारा चुनाव प्रचार में होने वाले खर्च के बारे भी जाना। और इसके अलावा राजनेतिक पार्टियां भी चुनाव के लिए लाखो करोड़ों रु खर्च करती है। इनके पास कहा से आता है इतना पैसा? राजनेतिक पार्टियों को व्यावसायिक क्षेत्र( कॉरपोरेट सेक्टर) और आम जनता से दान (डोनेशन) मिलता है, और यही इनके आय(इनकम) का मुख्य स्रोत है, और जिसकी कोई तय सीमा नहीं है।दान मे जो जितना चाहे और जैसे चाहे दे सकता है। यहां गुप्तदान भी स्वीकार जाते है। जो वह अपने प्रत्याशी को जितने के लिए प्रचार में इस्तेमाल करते है। लेकिन चुन कर आने के बाद विधायक और सांसद से राजनेतिक दलों को क्या फायदा है।
इस नफे/नुकसान(प्रॉफिट &लॉस) वाले दौर में व्यावसायिक क्षेत्र राजनेतिक दलों को इतना दान (डोनेशन) क्यों देते है, इससे उनको क्या फायदा? यह आपको समझना होगा। यहां सिर्फ विधायको और सांसदों के ५ साल की नोकरी की बात नहीं है। यहां विधायक, सांसद और राजनेतिक दलों का प्रचार माध्यमों पर और चुनाव पर होने वाले कुल खर्च उनके कुल आय( इनकम) से तालमेल नहीं रखती। और कोई भी राष्ट्रीय पार्टी उनके प्रत्याशी को जिताने के लिए लाखो करोड़ों रु खर्च कर जद्दोजहद क्यों करती है, इससे उन्हे क्या फायदा।
यहां हर राजनेतिक दलों का अपना अपना उद्देश्य होता है। जो वह अपने प्रत्याशी के सहयोग से सफल करने की कोशिश में है, और जिसके लिए वह कई व्यावसायिक क्षेत्र से आर्थिक सहायता की अपेक्षा रखते है। लेकिन व्यावसायिक क्षेत्र (कॉरपोरेट सेक्टर) उसके बदले मे उनके व्यवसाय में बढ़ोतरी कि मांग करते है। इस तरह व्यावसायिक को सरकार की नए नए योजनाओं से और प्रस्तावों से उन्हे व्यवसाय(ट्रेड) मिलता है और जिस किसी राजनेतिक दल की सरकार है उन्हे इसके एवज में अच्छा खासा दान(डोनेशन) मिलता है। यहां से शुरू होता है व्यापार, जो बड़े पैमाने पर होता है।
इसका एक छोटा उदाहरण देता हूं,
"सोचिए आपकी एक कंस्ट्रक्शन कंपनी है, और आपको सामान्य ग्राहकों की तुलना में ज्यादा मुनाफे की इच्छा है तो आप सरकारी काम करे, क्यों के सरकारी कामों का भुगतान अच्छे खासे मुनाफे के साथ किया जाता(no rate cutting) लेकिन सरकार आपको काम क्यों देगी, तो आप जिस राजनेतिक दल की सरकार है उस पार्टी को दान(डोनेशन) करे जिसके एवज में वह राजनेतिक दल अपने प्रत्याशीयों द्वारा आपके लिए किसी तरह के निर्माण कार्य का प्रस्ताव लाएगी, और उस प्रस्ताव को बहुमत से पास करवा कर अपने प्रचार माध्यमों द्वारा उसका सकारात्मक प्रचार करेगी। जनता के समक्ष उसे सरकार की उपलब्धि की तरह पेश किया जाएगा और उसका जनहित में किए कार्य की श्रेणी मे लाया जाएगा, और आपको आपका काम भी मिल जाएगा वह भी अच्छे खासे मुनाफे के साथ।
अब इसे उल्टा करके देखते है। आप किसी राजनेतिक दल को दान(डोनेशन) ना देकर उनके पूरे चुनाव प्रचार का खर्च उठा कर उनको सत्ता में लाए, अब आपके ही व्यापार के हित मे उनसे काम करवाए और सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल मे अपने जरूरत के अनुसार छूट ले। इसके साथ साथ वह राजनेतिक दल अपना उद्देश्य भी पूरा कर सकते है।"
यह आपको समझना होगा, यहां सत्ताधारियो के साथ व्यापार हो रहा है और प्रत्याशी उनकी नोकरी कर रहा है। यहां निजी कंपनिया सरकार बनाने के लिए निवेश करती है और जनता के प्रतिनिधियों को नोकरी पर रखा जाता है। जनता के प्रतिनिधि छोटे पैमाने पर भी इस व्यापार का हिस्सा बनते जा रहे है और निवेशक के कार्य को सफल करने के लिए सरकारी संसाधनों का और अधिकारों का इस्तेमाल करते हुवे देखे जा सकते है। सभी प्रचार माध्यमों को भी इस व्यापार में शामिल कर लिया जाता है। और आप वहीं देखते है, जो वह दिखाना चाहते है। आप वहीं सुनते है, जो वह सुनाना चाहते है। आप वहीं सोचते है, जो वह समझाना चाहते है। यही उन प्रचारकों का कौशल है।
लेकिन यह आपको समझना होगा। इस व्यवस्था को चलाने के लिए आपके पैसे का इस्तेमाल हो रहा है। सरकार आपके पैसों पर चलती है, सरकारी अधिकारियों को वेतन आपके पैसों से दिया जाता है, लेकिन वह अप्रत्यक्ष रूप से काम व्यापारियों के लिए कर रही है, और संसाधन आपके ही इस्तेमाल किए जाते है। आप लोग ही ग्राहक है और दुकान भी आपकी ही है और नोकर भी आपके है। आप गुलामी के तरफ बढ़ते जा रहे है, लेकिन आपको इसका एहसास भी नहीं होगा और आपको गुलामी ही देशभक्ति है ऐसा समझाया जाएगा।
लेकिन मेरा आपसे यह निवेदन है के आप अपने तर्क का इस्तेमाल करे और अपने अध्ययन शक्ति को जागृत रखे, नहीं तो आप अपने भविष्य खो देंगे और आप मानसिक गुलामी के तरफ बढ़ते जायेंगे।
आपको यह समझना होगा के इस स्वतंत्र और गणतंत्र दौर में क्या हमे किसी नेता की जरूरत है या सेवक की?क्या हमे किसी दलों की जरूरत है? आप से निवेदन है के किसी भी राजनेतिक प्रचारकों को सहयोग ना करे, जो आपकी सेवा करने का पात्र है उसे हि चुने, किसी भी आश्वासन या धखोस्लो पर विश्वास ना करे, सरकार के हर कार्य का आकलन करे के वह कार्य आपके हित में है या नहीं है उसे अपने अध्ययन के तराजू में तोलिए और अपने तर्क के आधार पर ही हर काम का समर्थन करे। हमेशा आपने चुने हुवे प्रत्याशी को अपना नेता समझना छोड़ दीजिए, वह आपका नेता नहीं है, वह आपका नोकर है, वह सही काम करेगा तो उसकी सरहाना कीजिए और अगर वह ठीक काम ना करे तो उसकी खुल के आलोचना करे। इस दौर मे हमे नेता(लीडर) की जरूरत नहीं है हमे अपना सेवक चुनना है।
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